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लोक पर कवितांश

लोक का कोशगत अर्थ—जगत

या संसार है और इसी अभिप्राय में लोक-परलोक की अवधारणाएँ विकसित हुई हैं। समाज और साहित्य के प्रसंग में सामान्यतः लोक और लोक-जीवन का प्रयोग साधारण लोगों और उनके आचार-विचार, रहन-सहन, मत और आस्था आदि के निरूपण के लिए किया जाता है। प्रस्तुत चयन में लोक विषयक कविताओं का एक विशेष और व्यापक संकलन किया गया है।

'अ' का स्थान

सभी अक्षरों की आदि में है

उसी प्रकार लोक का

आदि तो आदि भगवान है

तिरुवल्लुवर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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