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शत्रु पर कवितांश

शत्रु ऐसे अमित्र को

कहा जाता है जिसके साथ वैमनस्य का संबंध हो और जो हमारा अहित चाहता हो। आधुनिक विमर्शों में उन अवधारणाओं और प्रवृत्तियों की पहचान भी शत्रु के रूप में की गई है जो प्रत्यक्षतः या परोक्षतः आम जनमानस के हितों के प्रतिकूल सक्रिय हों। प्रस्तुत चयन में शत्रु और शत्रुता विषय का उपयोग कर वृहत संदर्भ-प्रसंग में प्रवेश करती कविताओं का संकलन किया गया है।

मूर्ख लोगों से

घनिष्ठ मित्रता की अपेक्षा

समझदार की शत्रुता

करोड़ों गुना अच्छी है

तिरुवल्लुवर

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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