अहंकार पर कवितांश
यहाँ प्रस्तुत चयन में
अहंकार विषयक कविताओं को संकलित किया गया है। रूढ़ अर्थ में यह स्वयं को अन्य से अधिक योग्य और समर्थ समझने का भाव है जो व्यक्ति का नकारात्मक गुण माना जाता है। वेदांत में इसे अंतःकरण की पाँच वृत्तियों में से एक माना गया है और सांख्य दर्शन में यह महत्त्व से उत्पन्न एक द्रव्य है। योगशास्त्र इसे अस्मिता के रूप में देखता है।
जिसने अहंकार ममकार का त्याग किया
वह देव लोगों को भी अप्राप्य
स्वर्गलोक को प्राप्त करेगा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere