जब मन आलस्य और भीरुतावश सच-झूठ, भला-बुरा सबको बिना प्रश्न मान लेता है, तभी से मनुष्यत्व की सर्वांगीण दुर्गति आरंभ हो जाती है।
पुरुष स्वचालित रूप से अंतरंगता और स्वतंत्रता की आवश्यकताओं के बीच झूलते रहते हैं।
जब तक मनुष्य प्रकृति की जिन द्वंदात्मक भ्रांतियों में उलझा रहता है, तब तक छल-कपटी माया ही उसकी आराध्य देवी होती है और वह एकमात्र सच्चे ईश्वर को नहीं जान सकता।
जब तक इस संसार से पाप बिल्कुल ही मिटा न दिया जाएगा, जब तक मनुष्य का मन पत्थर न बन जाएगा, तब तक इस पृथ्वी में अन्याय-मूल भ्रांति होती ही रहेगी और उसे क्षमा करके प्रश्रय भी देना ही पड़ेगा।
यह हैरानी की बात है कि यह भ्रम कितना संपूर्ण है कि सुंदरता ही अच्छाई है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere