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दंतक्षत पर उद्धरण

कामशास्त्र के आचार्यों

ने नखक्षत अनुसार ही दंतक्षत को भी कामवर्धक बताया है। इस प्रक्रिया में रति के क्षणों में प्रेमी-प्रेमिका, अपने दाँतों के स्पर्श से एक दूसरे अंगों पर कोमल चिह्न अंकित करते हैं। यह आघात नहीं—अनुराग का आलंकारिक स्पर्श है, जो वेदना और आनंद के सूक्ष्म संयोग से रति की तीव्रता को बढ़ाता है। प्रणय के क्षणों में नायक-नायिका द्वारा एक-दूसरे को सौंपा गया अनुराग-चिह्न है, जो कामकला का एक अंग है। इस चयन में ‘दंतक्षत’ के समय, स्थान, अवसर और प्रकार के कामशास्त्रीय विधियों का संकलन है।

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नायक और नायिका के राग (प्रेम) को बढ़ाने वाला, कोई और दूसरा सशक्त साधन नहीं है—जितना नखक्षत और दंतक्षत से उत्पन्न कामोत्तेजना।

वात्स्यायन
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जैसे सुअर किसी वस्तु को चबा ले, वैसे ही नायक नायिका के स्तनों के एक भाग को चबा लें, फिर दूसरी जगह पर दांत गड़ाए, फिर तीसरी जगह। इस तरह एक साथ लगे हुए लंबे-लंबे, ताम्रवर्ण के दंतक्षत के निशान पंक्तिबद्ध रूप में बने हों, तो ऐसा दंतक्षत 'वराहचर्वितक' कहलाता है।

वात्स्यायन
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दिन में लोगों की भीड़-भाड़ में, यदि नायक नायिका द्वारा किए गए दंतक्षतादि घावों को प्रदर्शित करे, तो नायिका को अपने को छिपाकर; अपने द्वारा किए गए चिह्नों को लक्ष्य कर हँसना चाहिए। खुले आम प्रेम प्रदर्शित करने का यही सर्वोत्तम तरीका है।

वात्स्यायन
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नायिका को अपने प्रियतम की छाती से लिपट कर, मुख उठाकर गले में बाँहें डाल; 'मणिमाला' तथा अन्य प्रकार के दंतक्षतों का प्रयोग करना चाहिए।

वात्स्यायन
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जब अधर को दाँतों से कसकर दबाया जाता है; जिससे अधर पर कुछ सूजन जाती है, तो उसे 'उच्छूनक' दंतक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन
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गूढ़क और उच्छूनक तथा बिंदु—ये तीनों दंतक्षत अधर के मध्य में किए जाते हैं।

वात्स्यायन
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दाँत और ओठ के संयोग और अभ्यास के द्वारा, जो दंतक्षत किया जाता है उसे 'प्रवालमणि' दंतक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन
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जब इस प्रकार से दंतक्षत किया जाए कि अधरों पर केवल हल्की लाली दिखाई दे और इसमें दाँत का घाव छिपा रहे, उसे 'गूढक' दंतक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन
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यदि सभी दाँतों से काटा जाता है, तो बिंदुओं की एक माला-सी बन जाती है। इस प्रकार का नखक्षत 'बिंदुमाला' कहलाता है।

वात्स्यायन
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गूढक, उच्छूनक, बिंदु, बिंदुपाल, प्रवालमणि, मणिमाला, खंडाभ्रक और वराह चर्वितक—ये आठ प्रकार के दंतक्षत होते हैं।

वात्स्यायन
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स्त्री को एक हाथ से पुरुष के बालों को पकड़कर; दूसरे हाथ से उसकी ठुड्डी उठाकर उसका मुख चूमना चाहिए, और पुरुष से लिपट कर, उन्मत्त हो दंतक्षत करना चाहिए।

वात्स्यायन
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रति-प्रसंगों में उत्तेजित हो, नायक-नायिका को प्रेम-कलह करना चाहिए। यदि नायक 'बिंदु' नामक दंतक्षत का प्रयोग करे, तो नायिका को 'बिंदुमाला' और 'बिंदुमाला' के बदले में नायक को 'खंडाभ्रक' दंतक्षत करना चाहिए।

वात्स्यायन
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कर्णपूर का चुम्बन और नखक्षत एवं दंतक्षत का प्रयोग—ये तीनों बाएँ कपोल के अलंकरण माने जाते हैं।

वात्स्यायन
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मस्तक पर लगाने के लिए भोजपत्र पर कर्णपूर के लिए नीलकमल, फूलों की चोटी, ताम्बूलपत्र और तमालपत्र पर नखक्षत एवं दंतक्षत से निशान बनाकर, नायिका के पास भेजना चाहिए।

वात्स्यायन
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मालव और आभीर देश की स्त्रियाँ आलिंगन, चुम्बन, नखक्षत एवं चूषण आदि क्रियाओं में विशेष रुचि रखती है, किंतु नखक्षत एवं दंतक्षत के भाव को वे पसंद नहीं करतीं—प्रहणन से अधिक प्रसन्न होती हैं।

वात्स्यायन
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यदि स्त्री के मना करने पर भी पुरुष नखक्षत, दंतक्षत आदि जो कुछ करें, तो उसे सहन करती हुई स्त्री भी उसी प्रकार उससे दुगुना नखक्षत, दंतक्षत करे।

वात्स्यायन
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नायिका के दंतक्षत के स्थान को दोनों दाँतों से काटने से जो चिन्ह बनता है, उसे 'बिंदु' नामक दंतक्षत कहते हैं।

वात्स्यायन

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