प्रस्तुत नहीं : अकेलापन कोई चुनता नहीं, वह दे दिया जाता है
कितना कुछ घट रहा है। दुनिया में, देश में, मुझ में। बहुत उलझन में हूँ। बहुत सारी बातें एक साथ सोच रहा हूँ। अपने मस्तिष्क में हर चीज़ का, हर स्थिति का हिसाब लगाने की कोशिश करता हुआ—घर के एक कोने से दूस
धुरंधर : दुख और जिन्न
दुख आदमी के जिस्म में दाख़िल होता है और फिर कभी नहीं निकलता। कोई मौलवी बताए, कोई हकीम समझाए, कोई फ़लसफ़ेबाज़ अपनी मोटी किताब खोलकर साबित करे—मगर दुख जाता नहीं। वो बदलता है। रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्