विष्णु खरे की संपूर्ण रचनाएँ
कविता 32
उद्धरण 27
हिंदी कविता में आज जहाँ सौभाग्यवश ऐसे कवि उपस्थित हैं, यद्यपि उनकी संख्या बहुत कम है; जो भारतीय तथा विश्व मानवता के सामने खड़े हुए संकटों की जटिलता को पहचान रहे हैं और आदमी होने के विविध पहलुओं से परिचित हैं, वहाँ तथाकथित कवियों और आलोचकों का एक बहुत बड़ा गिरोह नितांत व्यक्तिगत तथा सामयिक लाभांशों के लिए एक बहुत ख़राब कविता को कविता कह रहा है।