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रवींद्रनाथ टैगोर

1861 - 1941 | जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी, पश्चिम बंगाल

समादृत कवि-साहित्यकार-चित्रकार-दार्शनिक और समाज-सुधारक। राष्ट्रगान के रचयिता। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित।

समादृत कवि-साहित्यकार-चित्रकार-दार्शनिक और समाज-सुधारक। राष्ट्रगान के रचयिता। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित।

रवींद्रनाथ टैगोर की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 31

पत्र 15

कहानी 2

 

उद्धरण 585

भीतर के साथ बाहर का निश्चित विभाजन अगर बना रहे तो हमारा जीवन सुविहित, सुश्रृंखलित, सुसंपूर्ण हो जाता है, किंतु वही हमारे जीवन में नहीं हो पा रहा है।

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कलावान् गुणीजन भी जहाँ पर वास्तव में गुणी होते हैं; वहाँ पर वे तपस्वी होते हैं, वहाँ यथेच्छाचार नहीं चल सकता, वहाँ चित्त की साधना और संयम—है ही है।

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जगत से मन अपनी चीज़ संग्रह कर रहा है, उसी मन से विश्व-मानव-मन फिर अपनी चीज़ चुनकर, अपने लिए गढ़े ले रहा है।

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नियम साधना का लोभ भी कष्ट की मात्रा का हिसाब लगाकर आनंद पाता है। अगर कड़े बिछौने पर सोने से शुरू किया जाए; तो आगे चलकर मिट्टी पर बिछौना बिछाकर, फिर सिर्फ़ एक कंबल बिछाकर, फिर कंबल को भी छोड़कर निखहरी ज़मीन पर सोने का लोभ क्रमशः बढ़ता ही रहता है।

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संग्रहणीय वस्तु हाथ आते ही उसका उपयोग जानना, उसका प्रकृत परिचय प्राप्त करना, और जीवन के साथ-ही-साथ जीवन का आश्रयस्थल बनाते जाना—यही है रीतिमय शिक्षा।

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पुस्तकें 11

वीडियो 3

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