Font by Mehr Nastaliq Web
noImage

ललितकिशोरी

- 1883 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

वास्तविक नाम कुंदनलाल। सखी संप्रदाय में दीक्षित होकर ललित किशोरी नाम रखा। कृष्ण-भक्ति से ओत-प्रोत सरस पदों के लिए स्मरणीय।

वास्तविक नाम कुंदनलाल। सखी संप्रदाय में दीक्षित होकर ललित किशोरी नाम रखा। कृष्ण-भक्ति से ओत-प्रोत सरस पदों के लिए स्मरणीय।

ललितकिशोरी की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 12

कब हौं सेवा-कुंज में, ह्वै हौं स्याम तमाल।

लतिका कर गहि बिरमिहैं, ललित लड़ैतीलाल॥

मैं वृंदावन के सेवा-कुंज में कब ऐसा श्याम तमाल वृक्ष बन जाऊँगा जिसकी लताओं या शाखाओं को पकड़ कर प्रियतम श्रीकृष्ण विश्राम किया करेंगे।

सुमन-बाटिका-बिपिन में, ह्वै हौं कब मैं फूल।

कोमल कर दोउ भावते, धरिहैं बीनि दुकूल॥

वह दिन कब आएगा जब मैं पुष्पवाटिकाओं अर्थात् फूलों की बग़ीची या बाग़ों में ऐसा फूल बन जाऊँगा जिसे चुन-चुनकर प्रियतम श्रीकृष्ण और राधिका अपने दुपट्टे में धर लिया करेगी।

मिलिहैं कब अँग छार ह्वै, श्रीबन बीथिन धूरि।

परिहैं पद-पंकज जुगुल, मेरी जीवन-मूरि॥

मैं राख या धूल बनकर कब ब्रज के जीवन के मार्गों या पगडंडियों में जाऊँगा ताकि मेरे जीवनाधार श्री राधा-कृष्ण के चरण-कमल मुझ पर पड़ते रहें।

कदम-कुंज ह्वै हौं कबै, श्रीवृंदाबन माहिं।

ललितकिशोरी, लाड़िले, बिहरैंगे तिहिं छाहिं॥

ललितकिशोरी जी कहते हैं कि कब मैं श्री वृंदावन के कदंब कुंज में जाऊँगा जिनकी छाया में लाड़ले लाल श्रीकृष्ण विहार किया करते हैं।

कब कालीदह-कूल की, ह्वै हौं त्रिबिधि समीर।

जुगुल अँग-अँग लागिहौं, उड़िहै नूतन चीर॥

यमुना के कालीदह नामक घाट के किनारे की शीतल, मंद, सुगंधित तीन प्रकार की वायु कब बन जाऊँगा। और वायु बनकर राधाकृष्ण के अंगों का इस प्रकार से कब स्पर्श करूँगा जिससे कि उनके नए वस्त्र उड़ने या लहराने लगें।

पद 30

सवैया 1

 

उद्धरण 1

डूबा प्रेमसिंधु का कोई हमने नहीं उछलते देखा।

  • शेयर
 

Recitation

Jashn-e-Rekhta 10th Edition | 5-6-7 December Get Tickets Here

रजिस्टर कीजिए