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गवरी बाई

1758 | डूंगरपुर, राजस्थान

'वागड़ की मीरा' के उपनाम से भूषित। राजस्थान की निर्गुण भक्ति परंपरा से संबद्ध।

'वागड़ की मीरा' के उपनाम से भूषित। राजस्थान की निर्गुण भक्ति परंपरा से संबद्ध।

गवरी बाई की संपूर्ण रचनाएँ

दोहा 8

बन में गये हरि ना मिले, नरत करी नेहाल।

बन में तो भूंकते फिरे, मृग, रोझ, सीयाल॥

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अड़सठ तीरथ में फिरे, कोई बधारे बाल।

हिरदा शुद्ध किया बिना, मिले श्री गोपाल॥

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गवरी चित्त तो है भला, जो चेते चित मांय।

मनसा, वाचा, कर्मणा, गोविंद का गुन गाय॥

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छापा तिलक बनाय के, परधन की करें आसा।

आत्मतत्व जान्या नहीं, इंद्री-रस में माता॥

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गवरी चित में चेतिऐ, लालच लोभ निवार।

सील संतोष समता ग्रहे, हरि उतारे पार॥

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सबद 7

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