अलेक्सांद्र पूश्किन के कथाएँ
सोने का मुर्ग़ा
किसी राज्य में, किसी देश में किसी अजाने से प्रदेश में, ज़ार ददोन राज करता था जिससे हर राजा डरता था, बड़ा भयंकर था यौवन में बड़ा सूरमा रण-आँगन में, बड़े मोर्चे उसने मारे उससे लड़ सब दुश्मन हारे। वक़्त बुढ़ापे का जब आया मिले चैन, यह दिल ने चाहा, किंतु
क़िस्सा मछली मछुए का
नीले-नीले सागर तट पर घास-फूस की कुटी बना कर, तैंतीस वर्षों से उसमें ही बूढ़ा-बुढ़िया रहते थे, बुढ़िया बैठी सूत कातती बूढ़ा जल में जाल बिछाता, एक बार जो जाल बिछाया वह बस काई लेकर आया, बार दूसरी जाल बिछाया वह बस जल-झाड़ी ही लाया, बार तीसरी जाल
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere