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पद

पद छंद की ही एक विधा है। छंदों में मात्राओं या वर्णों की संख्या या क्रम निश्चित होते हैं, जबकि पद वर्णों या मात्राओं की गणना से मुक्त होता है। तुकांतता के निर्वाह से पद गेय होते हैं, इसलिए प्राचीन कवियों ने पदों पर शीर्षक के रूप में प्रायः रागों के नाम ही दिए हैं। पदों की परंपरा हिंदी साहित्य में विद्यापति से शुरू हुई जो भक्तिकाव्य से होती हुई छायावाद में महादेवी वर्मा तक निर्बाध चलती रही।

1817 -1886

रीतिकाल की भक्त कवयित्री। कविता में परंपरागत आदर्श का निरूपण।

1856 -1894

भारतेंदु युग के महत्त्वपूर्ण कवि, गद्यकार और संपादक। 'ब्राह्मण' पत्रिका से चर्चित।

1834

जोधपुर की महारानी। परिजनों की अकालमृत्यु के कारण असार संसार से विरक्त होकर कृष्ण-भक्ति में लीन हुईं और भक्ति के सरस पदों की रचना की।

1493 -1584

गोस्वामी वल्लभदास के शिष्य। पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय के अष्टछाप कवियों में से एक। माधुर्य भाव की भक्ति के लिए स्मरणीय कवि और गायक।

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