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श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र

1888 - 1969 | पबना, अन्य

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

प्रसिद्ध चिकित्सक और आध्यात्मिक चिंतक।

श्री श्रीठाकुर अनुकूलचन्द्र की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 1

 

उद्धरण 367

अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

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जिस काम में तुम्हें विरक्ति और क्रोध रहे हैं, निश्चय जानो वह व्यर्थ होने को है।

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किसी के द्वारा प्रतिहत होने पर, जो अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है—वही है अहं।

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संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।

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हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।

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