रश्मि रावत के लेख
उसके बाद ‘फिर’
साहित्य की दुनिया से शुरुआती परिचय के दिनों से ही समकालीन हिंदी आलोचना में नामवर जी की केंद्रीय भूमिका से परिचित हो चली थी । अनौपचारिक चर्चाओं में भी शोधार्थी और साहित्य-सेवी अपनी बात में वजन बढ़ाने के लिए अक्सर उनकी स्वीकृति को अकाट्य तर्क के तौर पर
चेतना की मुँदी आँखें
बचपन में मुँह से कोई शब्द ग़लत निकलता तो कोई टोककर ठीक करवा लेता। हम भी अन्यों की ऐसी ग़लतियों पर उन्हें बरज देते। ऐसे निर्मल, निर्दोष त्रुटि-सुधार भाषा निखारने में सहायक होते हैं। हिंदी क्षेत्र के परिदृश्य की बात करें तो जेंडर-संवेदना का शैशव काल ही
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere