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परमहंस योगानंद

परमहंस योगानंद की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 54

चित्त की मग्नता श्वास की धीमी गति पर निर्भर करती है। भय, काम, क्रोध आदि हानिकारक भावावेगों की अवस्थाओं में, श्वास अनिवार्य रूप से तेज़ या असमान गति से चलता है।

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जिस प्रकार सिनेमा के चित्र वास्तविक प्रतीत होते हैं; परंतु होते हैं मात्र प्रकाश और छाया के मिले-जुले चित्र, उसी प्रकार सृष्टि की विविधता भी एक भ्रम मात्र है।

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माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।

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यदि आध्यात्मिक शिक्षा द्वारा नहीं; तो विज्ञान द्वारा ही सही, मनुष्य को यह दार्शनिक सत्य समझ लेना चाहिए कि भौतिक जगत् नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उसका ताना-बाना भी केवल भ्रम है, माया है।

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विश्वबंधुत्व द्वारा शांति की स्थापना संसार का सर्वोच्च आदर्श है।

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