दो चार शब्द इधर-उधर से लेकर, कोई व्यक्ति किसी विद्वान से—जिसने संपूर्ण जीवन सरस्वती आराधना में बिताया हो—अगर प्रतिस्पर्धा करने चले, तो यह ऐसी ही अज्ञता होगी जैसे कि साँप, गज एवं सिंह के ललाट पर पैर रखने की मूर्खता, क्रमशः पक्षी, शश तथा सियार करें।
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यद्यपि मेघ को किसी वस्तु की इच्छा नहीं है, न ही उसमें स्वतः सामर्थ्य है, न किसी के प्रति विशेष प्रेम है और न किसी के साथ संसर्ग ही, फिर भी अति महान् वह जलद् संत्पत जनों के संताप को मिटाता ही है।
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दूसरे के पास जाने से; होने वाली अत्यंत चिंता रूप अग्नि की सैकड़ों ज्वालाओं से जिनका अंतःकरण अस्पृष्ट रहता है, ऐसे वे वृक्ष ही अच्छी प्रकार जीते हैं।
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जो परोपकार में संलग्र होने के कारण अपने स्वार्थ का परित्याग करता है, और गुणी व्यक्ति के साथ सदैव अभिन्नता का आचरण करता है, जिसके हृदय से, स्वभाव से ही सुंदर दातृगौरव स्फुरित होता है, जो शक्तिमान् है—ऐसा कोई उत्तम पुरुष सर्वश्रेष्ठ है।
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वानरों की सभा में वृक्षों की शाखाएँ कोमल आसन होती हैं, चीत्कार सुभाषित होता है, एवं दाँतों और नखों से फाड़ना स्वागत सत्कार होता है—यह ठीक ही है।
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