निंदा, प्रशंसा, इच्छा, आख्यान, अर्चना, प्रत्याख्यान, उपालंभ, प्रतिषेध, प्रेरणा, सांत्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन तेरह बातों में ही पत्र से ही प्रकट होने वाले अर्थ प्रवृत्त होते हैं।
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धर्म-हीन जीवित मनुष्य को मरे हुए के समान मानना चाहिए। धर्म-युक्त रहा मृत व्यक्ति भी निस्संदेह दीर्घजीवी ही है।
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जिस प्रकार जीभ पर रखे हुए मधु या विष के संबंध में कोई यह चाहे कि मैं इसका स्वाद न लूँ, यह संभव नहीं है। उसी प्रकार राजा के अर्थ-संबंधी कार्यों पर नियुक्त कर्मचारी उस अर्थ का थोड़ा भी स्वाद न लें, यह संभव नहीं है।
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निर्धन व्यक्ति सैकड़ों यत्न करने पर भी अपने अभीष्ट फलों को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। अर्थों को अर्थों से ही वैश में किया जाता है, जैसे हाथियों को दूसरे हाथियों द्वारा।
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पतित पुरुष के साथ यजन, अध्ययन और विवाह आदि संबंध करता हुआ एक पुरुष वर्ष में स्वयं पतित हो जाता है। फिर उसके साथ व्यवहार करने वाले अन्य पुरुष भी इसी प्रकार पतित हो जाते हैं।
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