कुसुम भट्ट की कहानियाँ
महुवा फूल झरने के बाद
औचक नज़र मिली और धक्क हुआ दिल... स्थिर हो गई शिवा... एक चेहरा जो उसके बगलगीर होकर गुजरा, उसे स्वीकार करने में पल दो पल लगे—हाँ...है तो वही...साँवले पिचके चेहरे पर भराव आ गया है। मोटे गाल लावण्यीय होकर दमकने लगे हैं। वह ठिठकने लगी थी, पर जाने क्या सोचकर
इस ज़हर की तासीर
“काली बौनी प्लास्टिक की कुर्सी खिसकाती है—बैठो...पानी दे मीना’’ बहू पास खड़ी है पानी का गिलास थामे। काली बौनी की आँखें चमकती हैं—“रास्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई बाबा?’’ इसके होंठों से षहद की झिरझिर बरस रही है, आँखें मेरे भीतर ख़ुब गई हैं—टटोल
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere