कवि को लिखने के लिए कोरी स्लेट कभी नहीं मिलती है। जो स्लेट उसे मिलती है, उस पर पहले से बहुत कुछ लिखा होता है। वह सिर्फ़ बीच की ख़ाली जगह को भरता है। इस भरने की प्रक्रिया में ही रचना की संभावना छिपी हुई है।
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कविता विचारहीन नहीं हो सकती, परंतु विचारात्मक प्रतिबद्धता को मैं कविता के लिए अनिवार्य नहीं मानता।
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मैं बोलता हूँ, इसलिए लिखता हूँ। मनुष्य के इतिहास में लिखना बोलने का अनुवर्ती है—लगभग यही बात रचना-प्रक्रिया पर भी लागू होती है।
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अगर किसी चीज़ को हम अमर मानकर चलें, तो जड़ता पैदा होगी और हर जड़ता से लड़ना होता है।
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साहित्य में सच्ची प्रतिबद्धता वहीं जन्म लेती है, जहाँ कला लेखक की संवेदना और उसके वैचारिक झुकाव को एक विलक्षण जादुई संतुलन में बदल लेती है।
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