अशोक मिश्र की कहानियाँ
दीनानाथ की चक्की
दीनानाथ आज अन्य दिनों की तुलना में काफ़ी उत्साहित दिख रहा था। उसका कारण भी साफ़ था, सवेरे-सवेरे अख़बार में उसे एक ख़बर पढ़ने को मिली थी कि सरकार हाईस्कूल, इंटर तक पढ़े शिक्षित बेरोज़गारों को एक लाख़ रुपए तक का क़र्ज़ देगी, जिसमें पच्चीस प्रतिशत की
कबाड़वाले की मौत
(नवें दशक के किसी एक दिन) वह कबाड़वाला था। साइकिल में लटकती बोरी, कांटे वाली हाथ से पकड़ने वाली तराज़ू और किलो—दो किलो के बटखरे देखकर ही पता चल जाता था कि वह कबाड़ी है। क़मीज़—पायजामा का बहुत सादा-सा पहनावा और पैरों में हवाई चप्पल और मुरझाए चेहरे पर
पत्रकार बुद्धिराम @ पत्रकारिता डॉट कॉम
बुद्धिराम की निगाहें कंप्यूटर पर और ऊंगलियाँ की बोर्ड पर थीं मगर ख़बर थी कि बन ही न रही थी... वह कहीं और ख़यालों में विचर रहा था। सीट पर सिर्फ़ उसका तन था जबकि मन कहीं और। सोच रहा था कि जिनकी वह दिल से इज़्ज़त करता है, जिनके एक आदेश पर टाइलेट तक रोककर
शोकसभा
हिंदी पत्रकार श्यामधर हैदराबाद स्थित एक आर्यसमाजी मिज़ाज वाले दैनिक अख़बार में नौकरी कर रहे थे। यह बीसवीं शताब्दी का अंतिम साल 2000 का था। पत्नी बच्चे की उम्मीद से थी, श्यामधर के लिए अकेले होने के चलते उसे साथ रखना संभव न था, बड़ा सवाल था कि पत्नी की
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere