अरुण प्रकाश की कहानियाँ
भैया एक्सप्रेस
इज़ ही ए भैया? ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती जा रही थी। दरवाज़े से लटके रामदेव के लिए धूल भरी तेज़ हवा में आँख खुली रखना मुश्किल था। कब तक लटका रहेगा बंद दरवाज़े पर? रामदेव ने दरवाज़े पर ज़ोर से थाप मारी। उसके कंधे से लटकता झोला गिरते-गिरते बचा। कुछ
जल-प्रांतर
दूर से मंदिर दिखाई देता था। चारों तरफ़ फैले अछोर पानी के बीच घिरा शिव मंदिर। पानी इतना गहरा था कि हवा के थपेड़े से लहरें भी कम ही उठ पाती थीं। हवा पूरी तेज़ी से फेंकी गई गेंद की तरह आती और पानी की सतह सहलाती आगे बढ़ जाती। पानी का किनारा धुँधला दीखता
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere