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आज भी कविता और गद्य की भाषा का अंतर भावावेश की भाषा का अंत है।
ख्याति न मिलने की कुंठा भीतर-भीतर विरोधी बना देती है।
समकालीनता-बोध से रहित आलोचना को आलोचना नहीं कहा जा सकता—शोध, पांडित्य या कुछ और भले ही कह दिया जाए।
जीनियस की प्रशंसा नहीं होती। या तो उसकी निंदा होती है या फिर applause होता है। प्रशंसा (Praise) सदैव ‘मीडियाकर’ की होती है। मसलन यह बहुत अच्छा पढ़ाता है, या उसका स्वभाव बहुत अच्छा है या वह बड़ा सज्जन है। ये सारे शब्द और विशेषण ‘मीडियाकर’ के पर्याय हैं।
वास्तव में श्रेष्ठ साहित्य की रचना परंपरा के भीतर युग के यथार्थ को समेट लेती है।
जब एक सही पंक्ति बन जाती है तो उसमें परिवर्तन संभव नहीं।
कला-सृष्टि जीवन की सार्थकता है। जीवन से उसे अलग देखना अपराध है।
जीवन की व्याख्या ही नहीं करनी पड़ती है, बल्कि जीवित रहने की प्रक्रिया भी खोजनी पड़ती है।