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Vrind

1643 - 1735 | جودھ پور, راجستھان

تمام تمام

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दुष्ट छांड़ै दुष्टता पोखै राखै ओट।

सरपहि केतौ हित करौ चुपै चलावै चोट॥

भावार्थ: वृन्द कवि कहते हैं कि दुष्ट व्यक्ति अपनी दुष्टता को नहीं छोड़ता है, उसे कितना भी पाला और पोसा जाए लेकिन वह अपने स्वभावगत दुष्टता और अवगुण को किसी भी स्थिति में नहीं छोड़ता है। जिस प्रकार साँप का कितना ही हित क्यों किया जाए लेकिन दब जाने पर वह काटेगा ही, क्योंकि वह स्वभाव के वशीभूत हो जाता है।

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कहुँ अवगुन सोइ होत गुन कहुँ गुन अवगुन होत।

कुच कठोर त्यौं हैं भले कोमल बुरे उदोत॥

भावार्थ: कवि कहते हैं कि स्थिति के आधार पर जो कहीं पर अवगुण होता है, वह गुण बन जाता है और कहीं पर जो गुण माना जाता है, वह अवगुण हो जाता है। गुण−अवगुण का निर्धारण रुचि और स्थिति पर ही निर्भर करता है। जिस प्रकार कुचों की कठोरता को अच्छा माना गया है और उनकी कोमलता को बुरा माना गया है। वैसे सामान्य स्थिति में कठोरता को अवगुण और कोमलता को गुण के रूप में अच्छा माना जाता है।

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मधुर बचन तैं जात मिट उत्तम जन अभिमान।

तनिक सीत जल सौं मिटै जैसे दूध उफान॥

भावार्थ: कवि कहते हैं कि मधुर वाणी के प्रभाव से बड़े−बड़ों का अभिमान भी मिट जाता है जिस प्रकार थोड़े से ठंडे पानी के छींटे देने से उबलता हुआ दूध भी शांत हो जाता है। अर्थात् दुष्ट व्यक्ति के घमंड को मधुर वाणी से ही मिटाया जा सकता है, उससे लड़ने−झगड़ने से नहीं।

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अन−उद्यमही एक कौ यौं हरि करत निबाह।

ज्यौं अजगर भख आनि कै निकसत बाही राह॥

भावार्थ: कवि कहते हैं कि इस संसार के रचनाकार भगवान इस धरती पर काम करने वालों का भी निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे संसार के प्राणियों के पालनहार हैं, इसलिए सभी के भोजन की व्यवस्था कर देते हैं। भगवान ने बिना परिश्रम के निर्वाह करने के लिए एक ही प्राणी की रचना की है। जैसे अजगर किसी का भक्षण करता है तो वह भक्षित जीव उसी रास्ते से वापस निकल जाता है। भाव यह है कि बिना परिश्रम के खाने वाला प्राणी सुखी नहीं रह सकता है।

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एकहि गुन ऐसौ भलौ जिहिँ अवगुन छिप जात।

नीरद के ज्यौं रंग बद बरसत ही मिट जात॥

भावार्थ: कवि कहता है कि व्यक्ति में एक ही ऐसा गुण होना चाहिए जिससे उसके व्यक्तित्व में समाए अनेक अवगुण छिप जाते हैं, अर्थात् उस विशिष्ट गुण के कारण उसके अन्य अवगुण प्रभावहीन हो जाते हैं। जिस प्रकार बादल के काले−धूमिल धब्बे उसके बरसने के बाद स्वयं ही मिट जाते हैं।

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