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Viyogi Hari

1895 - 1988 | مدھیہ پردیش

تمام تمام

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कहा भयौ इक दुर्ग जो, ढायौं रिपु रणधीर।

तुम तौ मानिनि-मान-गढ़, नित ढाहत, रति-बीर॥

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जयतु कंस-करि-केहरि! मधु-रिपु! केशी-काल।

कालिय-मद-मर्द्दन! हरे! केशव! कृष्ण कृपाल॥

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सहस फनी-फुंकार औ, काली-असि-झंकार।

बन्दों हनु-हुंकार त्यौं, राघव-धनु-टंकार॥

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तुच्छ स्वर्गहूँ गिनतु जो, इक स्वतंत्रता-काज।

बस, वाही के हाथ है, आज हिन्द की लाज॥

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गिरिवरू जापै धारि कै, राखी ब्रज-जन-लाज।

ताही छिगुनी कौ हमैं, बल बानो, यदुराज॥

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हमें चाहिए मुक्ति, जन्म भारत में पावैं।

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کتاب 5

 

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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