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Vishnu Khare

1940 - 2018 | مدھیہ پردیش

تمام تمام

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हर प्रकाशित पंक्ति साहित्य नहीं होती, बल्कि सच्चाई यह है कि हर युग में अधिकांश साहित्य ‘पेरिफ़ेरी’ का साहित्य होता है जो सिर्फ़ छपता चला जाता है।

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हिंदी कविता में आज जहाँ सौभाग्यवश ऐसे कवि उपस्थित हैं, यद्यपि उनकी संख्या बहुत कम है; जो भारतीय तथा विश्व मानवता के सामने खड़े हुए संकटों की जटिलता को पहचान रहे हैं और आदमी होने के विविध पहलुओं से परिचित हैं, वहाँ तथाकथित कवियों और आलोचकों का एक बहुत बड़ा गिरोह नितांत व्यक्तिगत तथा सामयिक लाभांशों के लिए एक बहुत ख़राब कविता को कविता कह रहा है।

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किसी अच्छे संकलन की एक भी अच्छी कविता की एक पंक्ति को भी, एक शब्द तक को भी आलस्य, लापरवाही, प्रमाद या अहंमन्यता में नज़रअंदाज़ करना; कवि का तो ज़्यादा कुछ नहीं बिगाड़ता, तथाकथित आलोचक की क़लई अवश्य खोल देता है।

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पिछले पैंतीस वर्षों से यह देश एक ऐसी कविता की माँग कर रहा है, जिसमें कला के साथ सब कुछ कह सकने का सहस तो हो ही—कभी-कभी कला की क़ीमत पर भी कहने का माद्दा हो।

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यदि दूसरे समर्थ कवियों की कविताएँ फ़ोटोग्राफ़ हैं, तो नागार्जुन की कविता 'आईज़ेनश्टाइन' की फ़िल्में हैं—इसमें मुक्तिबोध ही उनके समीप हैं।

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کتاب 3

 

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