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Shiv Sampati

کی

धर्म करो मन क्यों परो, कहो कुमति के धंध।

का करिहौ चलिहौ जबै, मूढ़! चारि के कंध॥

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विषै भोग की आस में, सब दिन दियो बिताय।

रे मन, करिहै काह अब, पीरी पहुँची आय॥

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सुबह साँझ के फेर में, गुजरी उमर तमाम।

द्विविधिा मँह खोये दोऊ, माया मिली राम॥

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लह्यो सुख जग ब्रह्म को, धर्यो हिय में ध्यान।

घर को भयो घाट को, जिमि धोबी को स्वान॥

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रे मन, नित रहिहै नहीं, तरुनापन अभिलाख।

चार दिना की चाँदनी, फिर अँधियारा पाख॥

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चतुरानन की चूक सब, कहलों कहिये गाय।

सतुआ मिलै संत को, गनिका लुचुई खाय॥

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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