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Sant Babalal

1435 - 1655

تمام تمام

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हिंदू तो हरिहर कहे, मुस्सलमान खुदाय।

साँचा सद्गुरु जे मिले, दुविधा रहे ना काय॥

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आशा विषय विकार की, बध्या जग संसार।

लख चौरासी फेर में, भरमत बारंबार

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जाके अंतर वासना, बाहर धरे ध्यान।

तिहँ को गोविंद ना मिले, अंत होत है हान॥

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देहा भीतर श्वास है, श्वासे भीतर जीव।

जीवे भीतर वासना, किस बिधि पाइये पीव॥

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जिन्ह को आशा कछु नहीं, आतम राखे शून्य।

तिहँ को नहिं कछु भर्मणा, लागे पाप पून्य॥

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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