आत्मघाती प्रवृत्तियाँ अंततः अमानवीय सामाजिक परिस्थितियों की ही मानस-उत्पाद हैं।
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मानवीय समाज के शायद अन्य किसी भी समूह के हिस्से में इतनी लंबी ग़ुलामी नहीं आई है, जितनी यह औरत के हिस्से में आई है।
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संवेदना, सरोकार और सौंदर्य की आकांक्षा के अभाव में सृजन संभव ही नहीं है।
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वे जो स्वयं को भद्र, सम्मानित और सुसंस्कृत मानने और मनवाने का पाखंड करते हैं, उनके व्यवहारों में छिपी या कभी-कभी कतई प्रकट हिंसा—संभवतः सबसे भयावह और सूक्ष्म हिंसा है।
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एक-दूसरे के लिए आत्मिक आकुलता की दैहिक अभिव्यक्ति, संभवतः संसार का पवित्रतम दृश्य निर्मित कर सकती है।
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