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Garibdas

1717 - 1778 | ہریانہ

تمام تمام

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साहब तेरी साहबी, कैसे जानी जाय।

त्रिसरेनू से झीन है, नैनों रहा समाय॥

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साहब मेरी बीनती, सुनो गरीब निवाज।

जल की बूँद महल रचा, भला बनाया साज॥

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भगति बिना क्या होत है, भरम रहा संसार।

रत्ती कंचन पाय नहिं, रावन चलती बार॥

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पारस हमारा नाम है, लोहा हमरी जात।

जड़ सेती जड़ पलटिया, तुम कूँ केतिक बात॥

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सुरत निरत मन पवन कूँ, करो एकत्तर यार।

द्वादस उलट समोय ले, दिल अंदर दीदार॥

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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