تمام تمام
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हे नाथ! जो नीतिमान मनुष्य आपका भजन करता है, वह 'अनीति' (अर्थात् ईतिरहित, उपद्रवरहित) हो जाता है। जिसे आप अपने हृदय से मुक्त नहीं करते हैं, वह मनुष्य अवश्य ही मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य सदैव आपकी अप-चिति (पूजा) में तत्पर रहता है, वह कभी भी अपचिति (हीनता) को प्राप्त नहीं होता। इसी कारण हे विभो! मैंने आप 'भव' (विश्व के भी कारण) की शरण ली है तो फिर मैं 'अभव' (जल-मरण रूप संसार-चक्र से रहित) क्यों नहीं होता?