अगलित स्नेह में में पके हुए लोग लाखों योजन भी चले जाएँ और सौ वर्ष बाद भी यदि मिलें तो हे सखि, मैत्री का भाव वही रहता है।
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अङ्गहिं अङ्ग न मिलिउ हलि अहरेँ अहरु न पत्तु।
पिअ जोअन्तिहे मुह-कमलु एम्वइ सुरउ समत्तु॥
हे सखि, अंगों से अंग नहीं मिला; अधर से अधरों का संयोग नहीं हुआ; प्रिय का मुख-कमल देखते-देखते यों ही सुरत समाप्त हो गई।
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साव-सलोणी गोरडी नवखी क वि विस-गंठि।
भडु पच्चलिओ सो मरइ जासु न लग्गइ कंठि॥
सर्वांग सुंदर गोरी कोई नोखी विष की गाँठ है। योद्धा वास्तव में वह मरता है जिसके कंठ से वह नहीं लगती।
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पाइ विलग्गी अन्त्रडी सिरु ल्हसिउँ खन्धस्सु।
तो वि कटारइ हत्थडउ बलि किज्जउं कंतस्सु॥
पाँव तक अँतड़ियाँ लटक रही हैं, सिर (कटकर) कंधे से झूल गया है, लेकिन हाथ कटारी पर है। ऐसे कंत की मैं बलि जाऊँ।
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जइ ससणेही तो मुइअ अह जीवइ निन्नेह।
विहिं वि पयारेंहिं गइअ धण किं गज्जहिं खल मेह॥
यदि वह प्रेम में है (और प्रिय के साथ नहीं है) तो मर गई और यदि जीवित है व स्नेह से वंचित है (तब भी मर गई)। धन्या दोनों ही तरह से गई; हे दुष्ट मेघ, अब क्यों गरजते हो?
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