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Dhruvdas

تمام تمام

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प्रेम-रसासव छकि दोऊ, करत बिलास विनोद।

चढ़त रहत, उतरत नहीं, गौर स्याम-छबि मोद॥

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रसनिधि रसिक किसोरबिबि, सहचरि परम प्रबीन।

महाप्रेम-रस-मोद में, रहति निरंतर लीन॥

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जिनके हिय में बसत हैं, राधावल्लभ लाल॥

तिनकी पदरज लेइ 'ध्रुव, पिवत रहौ सब काल॥

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कुँवरि छबीली अमित छवि, छिन-छिन औरै और।

रहि गये चितवत चित्र से, परम रसिक शिरमौर॥

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फूलसों फूलनि ऐन रची सुख सैन सुदेश सुरंग सुहाई।

लाड़िलीलाल बिलास की रासि पानिप रूप बढ़ी अधिकाई॥

सखी चहूँओर बिलौकैं झरोखनि जाति नहीं उपमा ध्रुव पाई।

खंजन कोटि जुरे छबि के ऐंकि नैननि की नव कुंज बनाई॥

दोहा-नवल रंगीली कुंज में, नवल रंगीले लाल।

नवल रंगीली खेल रचो, चितवनि नैन बिशाल॥

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