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Chaturbhujdas

1518 - 1585 | جبل پور, مدھیہ پردیش

کی

सकल तू बल-छल छाँड़ि, मुग्ध सेवै मुरलीधर।

मिटहिं सहा भव-द्वंद फंद, कटि रटि राधावर॥

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वत्सलता अरु अभय सदा, आरत-अघ-सोखन।

दीनबंधु सुखसिंधु सकल, सुख दै दुख-मोचन॥

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अखिल लोक के जीव हैं, जु तिन को जीवन जल।

सकल सिद्धि अरु रिद्धि जानि, जीवन जु भक्ति-फल॥

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और धर्म अरु कर्म करत, भव-भटक मिटिहै।

जुगम-महाशृंखला जु, हरि-भजनन कटिहै॥

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प्रगट वंदन रसना जु प्रगट, अरु प्रगट नाम रढ़ि।

जीभ निसेनी मुक्ति तिहि बल, आरोहि मृढ़ चढ़ि॥

ऊँच नीच पद चहत ताहि, कामिक कर्म करिहै।

कबहुँ होइ सुरराज कबहुँ, तिर्यक-तनु धरिहै॥

‘चत्रभुज' मुरलीधर-कृपा परै पार, हरि-भजन-बल।

छीपा, चमार, ताँती, तुरक, जगमगात जाने सकल॥

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