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रोगी भोगी आलसी, बहमी हठी अज्ञान।

ये गुन दारिदवान के, सदा रहत भयवान॥

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बलधन मैं सिंह ना लसैं, ना कागन मैं हंस।

पंडित लसै मूढ़ मैं, हय खर मैं प्रशंस॥

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मनुख जनम ले क्या किया, धर्म अर्थ काम।

सो कुच अज के कंठ मैं, उपजे गए निकाम॥

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अधिक सरलता सुखद नहिं, तेखो विपिननिहार।

सीधे बिरवा कटि गए, बाँके खरे हजार॥

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बोलि उठै औसर बिना, ताका रहै मान।

जैसैं कातिक बरसतैं, निंदैं सकल जहान॥

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औसर लखिये बोलिये, जथा जोगता बैन।

सावन भादौं बरसतैं, सबही पावैं चैन॥

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तेता आरँभ ठानिये, जेता तन में ज़ोर।

तेता पाँव पसारिये, जेती लाँबी सोर॥

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भला कियै करिहै बुरा, दुर्जन सहज सुभाय।

पय पायैं विष देत है, फणी महा दुखदाय॥

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एक चरन हू नित पढ़ै, तो काटै अज्ञान।

पनिहारी की लेज सौं, सहज कटै पाषान॥

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नहीं मान कुल रूप कौ, जगत मान धनवान।

लखि चँडाल के बिपुल धन, लोक करैं सनमान॥

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झूठी मीठी तनक सी, अधिकी मानैं कौन।

अनसरतै बोलौ इसी, ज्यौं आटै मैं नौन॥

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निसि में दीपक चंद्रमा, दिन में दीपक सूर।

सर्व लोक दीपक धरम, कुल दीपक सुत सूर॥

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सुजन सुखी दुरजन डरैं, करैं न्याय धन संच।

प्रजा पलै पख ना करैं, श्रेष्ठ नृपति गुन पंच॥

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सीख सरल कौं दीजियै, विकट मिलैं दुख होय।

बये सीख कपि कौं दई, दिया घोंसला खोय॥

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नृप चालै ताही चलन, प्रजा चलै वा चाल।

जा पथ जा गजराज तहँ, जात जूथ गजवाल॥

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अति खाने तैं रोग ह्वै, अति बोले ज्या मान।

अति सोये धन हानि ह्वै, अति मति करौ सयान॥

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सींग पूँछ बिनु बैल हैं, मानुष बिना बिबेक।

भख्य अभख समझैं नहीं, भगिनि भामिनी एक॥

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मुख तैं बोले मिष्ट जो, उर में राखै घात।

मीत नहीं वह दुष्ट है, तुरंत त्यागिये भ्रात॥

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काल करा दे मित्रता, काल करा दे रार।

कालखेप पंडित करैं, उलझैं निपट गँवार॥

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संपति के सब ही हितू, बिपदा में सब दूर।

सूखौ सर पंखी तजैं, सेवैं जलतें पूर॥

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पर औगुन मुख ना कहैं, पोषैं पर के प्रान।

बिपता में धीरज भजैं, ये लच्छन विद्वान॥

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नृप सेवा तैं नष्ट दुज, नारि नष्ट बिन सील।

गनिका नष्ट संतोष तैं, भूप नष्ट चित ढील॥

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मन तुरंग चंचल मिल्या, बाग हाथ में राखि।

जा छन ही गाफ़िल रहौ, ता छिन डारै नाखि॥

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भला बुरा लखिये नहीं, आये अपने द्वार।

मधुर बोल जस लीजिये, नातर अजस तैयार॥

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कूर कुरूपा कलहिनी, करकस बैन कठोर।

ऐसी भूतनि भोगि बो, बसिबो नरकनि घोर॥

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अति लोलुप आसक्त कैं, बिपदा नाहीं दूर।

मीन मरे कंटक फँसै, दौरि मांस लखि कूर॥

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उद्यम साहस धीरता, पराक्रमी मतिमान।

एते गुन जा पुरुष मैं, सो निरभै बलवान॥

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जतन थकी नरकौं मिलै, बिना जतन लैं आन।

बासन भरि नर पीत हैं, पशु पीवैं सब थान॥

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सहैं निरादर दुरबचन, मार दंड अपमान।

चोर चुगल परदाररत, लोभि लबार अजान॥

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एक मात के सुत भये, एक मते नहिं कोय।

जैसैं काँटे बेर के, बाँके सीधे होय॥

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बैर करौ वा हित करौ, होत सबल तैं हारि।

मीत भयै गौरव घटै, शत्रु भयैं दे मारि॥

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हंकारी व्यसनी हठी, आरसवान अज्ञान।

भृत्य ऐसा राखिये, करै मनोरथ हान॥

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बोधत शास्त्र सुबुधि सहित, कुबुधी बोध लहै न।

दीप प्रकास कहा करै, जाके अंधे नैन॥

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नदी तीर को रूखरा, करि बिनु अंकुश नार।

राजा मंत्री तैं रहित, बिगरत लगै बार॥

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दुष्ट मिलत ही साधुजन, नहीं दुष्ट ह्वै जाय।

चंदन तरु को सर्प लगि, विष नहिं देत बनाय॥

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पतिब्रता सतपुरुष को, गाढ़ा धीर सुभाव।

भूख सहै दारिद सहै, करै हीन उपाव॥

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तजैं नारि सुत बंधु जन, दारिद आयैं साथि।

फिरि आमद लखि आयकै, मिलिहैं वांथावांथि॥

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जाका दुरजन क्या करैं, छमा हाथ तरवार।

बिना तिना की भूमि पर, आगि बुझै लगि बार॥

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धूप छाँह ज्यों फिरत है, संपति बिपति सदीव।

हरष शोक करि क्यों फँसत, मूढ़ अयानी जीव॥

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अगनि चोर भूपति बिपति, डरत रहै धनवान।

निर्धन नींद निसंक ले, मानै काकी हान॥

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प्रथम धरम पीछै अरथ, बहुरि काम कौं सेय।

अंत मोक्ष साधै सुधी, सो अविचल सुख लेय॥

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तृष्णा मिटै सँतोष तैं, सेयें अति बढ़ि जाय।

तृन डारैं आग ना बुझैं, तृनारहित बुझ जाय॥

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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