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Bharatendu Harishchandra

1850 - 1885 | وارانسی, اتر پردیش

تمام تمام

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प्रेम प्रेम सब ही कहत प्रेम जान्यौ कोय।

जो पै जानहि प्रेम तो मरै जगत क्यों रोय॥

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लोक-लाज की गांठरी पहिले देइ डुबाय।

प्रेम-सरोवर पंथ में पाछें राखै पाय॥

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प्रेम सकल श्रुति-सार है प्रेम सकल स्मृति-मूल।

प्रेम पुरान-प्रमाण है कोउ प्रेम के तूल॥

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प्रेम सकल श्रुतिसार है, प्रेम सकल स्मृति-मूल।

प्रेम पुरान प्रमाण है, कोउ प्रेम के तूल॥

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सब दीननि की दीनता, सब पापिन को पाप।

सिमट आइ मों में रह्यो, यह मन समुझहु आप॥

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کتاب 3

 

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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