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Bakhna

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“वखना” बांणी सो भली, जा बांणी में राम।

बकणा सुणनां वोलणां, राम बिना बेकांम॥

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कीड़ी कुंजर सूँ लटै, गाइ सिंघ कै संग।

“बखना” भजन प्रताप थैं, निवाला मवलौ संग॥

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बन मैं होती केतकी, जरी जु काहूं दंगि।

भँवर प्रीति कै कारणैं, भसम चढावत अंगि॥

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हरि रस महंगा मोल कौ, 'बखना' लियौ जाइ।

तन मन जोबन शीश दे सोई पीवौ आइ॥

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'बखना' मनका बहुत रंग, पल-पल माहैं होइ।

एक रंग मैं रहैगा, सो जन बिरला कोइ॥

पहली था सौ अब नहीं, अब सौ पछैं थाइ।

हरि भजि विलम कीजिये, 'बखना' बारौ जाइ॥

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दूध मिल्यौ ज्यूं नीर मैं, जल मिसरी इकरूप।

सेवग स्वांमी नांव द्वै, 'बखना' एक सरूप॥

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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