लोग समझदार हो गए हैं, इसलिए अविरोध की साधना में लग गए हैं।
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मानवीय संवेदना के मूल स्वभाव को ठीक से समझे बिना सब कुछ को ख़ारिज कर देने का औद्धत्य कभी फलप्रसू नहीं होता।
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चेतना और रूचि का फलक बड़ा होना ही चाहिए।
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सबको प्रीत करके सबसे मीठ बने रहने की हमारी स्पृहा हमें विरूप और प्रकाशहीन बना देती है।
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खनखनाते हुए मणिमय मुक्ताहार, सोने के नूपुर, कुंकम के अंगराग, सुगंधित पुष्प, विचित्र मालाएँ, रंगबिरंगे वस्त्र—इन सब चीज़ों की मूर्खों ने नारी में कल्पना कर ली है किंतु भीतर-बाहर विचारने वालों के लिए तो स्त्रियाँ नरक ही हैं।
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