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Shridhar Pathak

1860 - 1928 | فیروزآباد, اتر پردیش

کی

चरन-चपल-धरनी-धरनि, फिरनि चारु-दृग-कोर।

सुगढ़ गठनि बैठनि उठनि, त्यों चितवनि चित चोर॥

अनियारे आयत बड़े, कजरारे दोउ नैन।

अचक आय जिय में गड़े, काढ़ैं ढीठ कढ़ैं न॥

  • विषय : 1

सहज बंक-भ्रकुटी-फुरनि, बात करन की बेर।

मृदु निशंक बोलनि हँसनि, बसी आय जिय फेर॥

रसना को रस ना मिलै, अनत अहो रसखान।

कान सुनैं नहिं आन गुन, नैन लखैं नहिं आन॥

निहचै या संसार में, दुर्लभ साँचौ नेह।

नेह जहाँ साँचौ तहाँ, कहाँ प्रान कहाँ देह॥

  • विषय : 1

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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