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Leeladhar Jagudi

1940 | اتراکھنڈ

تمام تمام

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भाषिक अभिव्यक्ति का रूप-रस, कविता द्वारा ही बचाया जा सकता है।

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बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।

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ईश्वर जब हमारी भाषाएँ नहीं समझता तो हमारी प्रार्थनाएँ क्या समझता होगा? पर अगर ईश्वर इतनी सारी भाषाओं में कवियों की प्रार्थनाएँ समझता है, तो ईश्वर सबसे बड़ा अनुवादक है। उसका अनुवाद अनुभाग, सर्वाधिक संवेदनशील और सबसे एक साथ संवाद जारी रखने में सक्षम एवं सक्रिय है। हो सकता है उसका कोई प्रवक्ता आकर कहे कि ईश्वर पर नहीं, अपनी भाषा पर संदेह करो।

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मनुष्यता के मूलभूत गुण और मानवीय क्रूरताओं के समकालीन अत्याचारों के बीच, कोई भी एक तटस्थ लेखक हो ही नहीं सकता। लेखक कैमरा नहीं है, लेखक एक संवेदनशील आँख है, जिसके पास विचारधारा से पहले आँसुओं की धारा है। मुझे लगता है, मैं कवि होकर ख़ुद का ही शिकार कर रहा हूँ और ख़ुद अपने मनुष्य होने का शिकार हो रहा हूँ।

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बसंत के अंतरतम में, पतझर भी आवाज़ देता हुआ अपना आकार ले लेता है।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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