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G. Shankar Kurup

1901 - 1978 | یرناکولم, کیرلا

تمام تمام

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मेरा जीवन मरुभूमि बन गया है।

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वही मनुष्य धन्य है जो स्वधर्म में रत है।

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हे मानव! जब से मैंने तुम्हारी भाषा सीखी, तब से वह विश्व-विमोहक भाषा भूल गया जिसमें स्नेह छोड़कर कोई शास्त्र नहीं, आनंद को छोड़कर कोई अर्थ नहीं, रूप को छोड़कर कोई छंद नहीं।

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जीवन ही गान है, काल ही ताल है, मन के विशेष भाव ही विभिन्न राग हैं, समूचा विश्व मंडल ही लय है।

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यह शरीर केवल एक दीपक है—प्राणों के प्रज्वलित होने के लिए। मिट्टी के इस दीप के प्रति इस प्रकार मुग्ध हो जाना क्या उचित हुआ? लावण्य तो मात्र इंद्रजाल है उस दोप का। हाय, साहसी अनुराग ने आपकी बुद्धि की आँखें मूँद दीं।

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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