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Arjundas Kediya

1856 - 1931 | جے پور, راجستھان

تمام تمام

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काटत हू बितरत बिमल, परिमल मलयज-मूल।

सींचत हू घृत दूध मधु, सूलहि सृजत बबूल॥

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प्रकृति पलटत साधु खल, पाय कुसंग सुसंग।

पंक-दोष पदम गहत, चंदन गुन भुजंग॥

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सूम साँचि धरि जात धन, भाग्यवान के हेतु।

दाँत दलत पीसत घिसत, रस रसना ही लेतु॥

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अनहित हू जो जगत को, दुर्जन बृश्चिक ब्याल।

तजत न, तो हित क्यों तजै, संतत संत दयाल॥

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कै धन धनिक कि धनिक धन, तजिहैं अवसि अक्रूर।

तिहिं धन लौं त्यागत धरम, तिन धनिकन-सिर धूर॥

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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