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Sri Srithakur Anukulchandra

1888 - 1969 | دوسرا

تمام تمام

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अनुभव करो; किंतु अभिभूत मत हो पड़ो, अन्यथा चल नहीं पाओगे। यदि अभिभूत होना है, तो ईश्वरप्रेम में हो जाओ।

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जिस काम में तुम्हें विरक्ति और क्रोध रहे हैं, निश्चय जानो वह व्यर्थ होने को है।

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किसी के द्वारा प्रतिहत होने पर, जो अपने को प्रतिष्ठित करना चाहता है—वही है अहं।

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हृदय-विनिमय प्रेम का लक्षण है और तुम यदि उसी हृदय को गोपन करते हो, तो यह निश्चित है कि तुम स्वार्थभावापन्न हो, उनको केवल बातों से प्रेम करते हो।

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संकीर्णता के निकट जाने से मन संकीर्ण हो जाता है, एवं विस्तृति के निकट जाने से मन विस्तृति लाभ करता है। उसी प्रकार भक्त के निकट जाने से मन उदार होता है, और जितनी उदारता है उतनी ही शांति।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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