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Gavri Bai

1758 | راجستھان

تمام تمام

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बन में गये हरि ना मिले, नरत करी नेहाल।

बन में तो भूंकते फिरे, मृग, रोझ, सीयाल॥

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अड़सठ तीरथ में फिरे, कोई बधारे बाल।

हिरदा शुद्ध किया बिना, मिले श्री गोपाल॥

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छापा तिलक बनाय के, परधन की करें आसा।

आत्मतत्व जान्या नहीं, इंद्री-रस में माता॥

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गवरी चित्त तो है भला, जो चेते चित मांय।

मनसा, वाचा, कर्मणा, गोविंद का गुन गाय॥

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गवरी चित में चेतिऐ, लालच लोभ निवार।

सील संतोष समता ग्रहे, हरि उतारे पार॥

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हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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