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Deendayal Giri

1802 - 1858 | بنارس, اتر پردیش

تمام تمام

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बड़े बड़न के भार कों, सहैं अधम गँवार।

साल तरुन मैं गज बँधै, नहि आँकन की डार॥

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गये असज्जन की सभा, बुध महिमा नहिं होय।

जिमि कागन की मंडली, हंस सोहत कोय॥

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खल जन को विद्या मिलै, दिन-दिन बढ़ै गुमान।

बढ़ै गरल बहु भुजंग कों, जथा किये पयपान॥

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साधुन की निंदा बिना, नहीं नीच बिरमात।

पियत सकल रस काग खल, बिनु मल नहीं अघात॥

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तहाँ नहीं कछु भय जहाँ, अपनी जाति पास।

काठ बिना कुठार कहुँ, तरु को करत बिनास॥

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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