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Ashfaqulla Khan

1900 - 1927 | شاہ جہاں پور, اتر پردیش

تمام تمام

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क्या मेरे लिए इससे बढ़कर कोई इज़्ज़त हो सकती है। कि सबसे पहला और अव्वल मुसलमान हूँ जो आज़ादिये वतन की ख़ातिर फाँसी पा रहा है?

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शहीदों के मज़ारों पर लगेगें हर बरस मेले

वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशां होगा।

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शहीदाने वतन का ख़ून इक दिन रंग लाएगा

चमन में फूट निकलेगा यह बरगे अर्गवाँ होकर।

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कोई इंगलिश कोई जर्मन कोई रशियन कोई टर्की, मिटाने वाले हैं अपने हिंदी जो आज हमको मिटा रहे हैं।

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Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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