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Sarvepalli Radhakrishnan

1888 - 1975

تمام تمام

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हमें तो एक ही धर्म की आवश्यकता है जो मानवात्मा को मुक्त करता हो; जो मनुष्य के मन में भय को नहीं आस्था को, औपचारिकता को नहीं स्वाभाविकता को, यांत्रिक जीवन की नीरसता को नहीं नैसर्गिक जीवन की रसात्मकता को बढ़ावा देता हो। हमें नहीं चाहिए ऐसा धर्म जो मनुष्य के मन का यंत्रीकरण कर देता हो, जिसका फल धार्मिक कट्टरता के रूप में सामने आता है। हमें ऐसा धर्म नहीं चाहिए जो लक्ष्यों का यंत्रीकरण करके अपने अनुयायियों से बिल्कुल एक जैसा आचरण करने की माँग करने लगता है।

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धर्म विश्वास की अपेक्षा व्यवहार अधिक है।

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धर्म का प्रयोजन है इस प्रज्ञा-जगत से, इस विभक्त चेतना वाले जगत से, जिसमें विभेद है, द्वित्व है, सामरस्य-मय, स्वातंत्र्यमय एवं प्रेममय जीवन में विकसित होने में हमारी सहायता करना।

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धर्म एक आंतरिक रूपांतरण है, एक आध्यात्मिक परिवर्तन है, हमारे अपने स्वभाव के विसंवादी स्वरों सामंजस्य लाने की क्रिया है—और उसका यह रूप इतिहास के आरंभ से ही मिलता आया है, यही उसका मूल स्वरूप है।

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नास्तिकता प्रायः धर्म की प्राणशक्ति की अभिव्यक्ति रही है, धर्म में वास्तविकता की खोज रही है।

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کتاب 3

 

Recitation

हिन्दवी उत्सव, 27 जुलाई 2025, सीरी फ़ोर्ट ऑडिटोरियम, नई दिल्ली

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